यदि आप उद्दिग्नता से ग्रस्त हैं तो आपने इसके बारे में काफी कुछ पढ़ा होगा। उद्दिग्नता के प्रकारों के बारे में भी पढ़ा होगा। आपके बीमारी के डाइग्नोसिस से आपका जीवन सुधर नहीं जायेगा। फिर उद्दिग्नता से पीड़ित व्यक्ति किसी विशेष प्रकार की उद्दिग्नता के खांचे में बैठाया जा सके यह आवश्यक नहीं है। सामान्यतया उद्दिग्नता से पीड़ित व्यक्ति किसी डाइग्नोसिस विशेष के खांचे में बैठने की बजाय विभिन्न प्रकार की उद्दिग्नताओं के कहीं बीच में रहता है।
यदि एक बार कोई लेबल लग जाता है तो उसको हटाना मुश्किल रहता है। इसलिए इसका न लगाना ही उचित है। फिर भी हम केवल विवरण की सुविधा के लिए विभिन्न प्रकार के anxiety disorders के बारे में जानना चाहते हैं।
पेनिक अटेक (panic attack)
पनिक अटेक अचानक से डर की अनुभूति होना है। इसके साथ तीव्र शारीरिक संवेदनाये होती हैं जैसे कि उन स्थानों से भागने कीइच्छा होना जहाँ पर ये संवेदनाये होती हैं। साथ ही एक ऐसी मानसिक संभावना की कुछ गंभीर रूप से गलत होने वाला है। दिल की धड़कन का तेज होना, छाती में अकदन या दर्द, साँस फूलना, कंपकपी, पसीना, चक्कर, मितली या उलटी, हाथ पैर का सुन्न या ठंडा पद जाना, या फिर हाथ पैरों या चेहरे पर गर्मी महसूस करना, ये कुछ अनुभव हैं जो पेनिक अटेक के वक्त हो सकते हैं। पागल होने का डर या कुछ असंयमित बर्ताव कर देने का डर भी हो सकता है।
राजेश की कहानी
"जब मै एक नौकरी के इंटरव्यू के लिए जा रहा था तब मुझे ऐसा लगा की मेरा सर घूम रहा है, दिल इतनी जोर से धड़क रहा था मानो छाती फटी पड़ती हो। मेरा सर ऐसा लग रहा था की एक गुब्बारा है और किसी भी क्षण फट सकता है। मेरे हाथ कांप रहे थे और हथेलियाँ गीली थीं। मेरी उँगलियाँ सुन्न लग रही थी। मेरी छाती में इतने तेज़ दर्द हो रहा था मानो मुझे दिल का दौरा पड़ गया हो। समय के साथ चक्कर बढ़ते गए। मैंने अपनी साँस थामने की बहुत कोशिश की पर मै उसमे असफल रहा। मैंने इंटरव्यू देने की कोशिश की पर मुझे कुछ समझ में नहीं आया। "
पेनिक अटेक पेनिक बीमारी में कैसे बदलता है:
बिना किसी कारन के यदि बार बार पेनिक अटेक आते हैं तो ये हो सकता है की आप पेनिक बीमारी से ग्रस्त हों। परन्तु पेनिक अटेक आना यह कोई बीमारी नहीं है। बहुत से लोगों में साल में एकाध बार पेनिक अटेक आते हैं। पेनिक डिसोर्डर का तात्पर्य है कि यदि व्यक्ति अगले अटेक के आने की संभावना से ऐसी व्यक्तियों, एवं स्थानों को टाला जा सके जहाँ पेनिक अटेक आने की सम्भावना रहती है।
सुनीता की कहानी:
मुझे हमेशा घर से बाहर निकलने में डर लगता है। मै इतना डरी हुई रहती हूँ की हमेशा यह ध्यान रखती हूँ की कोई भागने का रास्ता है या नहीं। मंदिर, बाज़ार या अन्य कोई ज़गह मै अकेले जाना पसंद करती हूँ, जिससे की यदि कोई पेनिक अटेक आये तो मेरे साथ मै जो है उसे मालूम न पड़े और मै वहां से भाग कर घर आ सकूँ। या फिर मै किसी ऐसे सुरक्षित व्यक्ति के साथ ही बाहर निकलना पसंद करती हूँ। बाहर जाने पर मेरा पेट गड़बड़ हो जाता है। बाहर जाते समय मै अपने पेट के गड़बड़ होने की वजह से सिर्फ ऐसी जगह जाती हूँ जहाँ पर toilet हो।
यह ब्लॉग एवं उसके पोस्ट जनता की संपत्ति हैं। इसपर ब्लॉग स्वामी का कोई अधिकार नहीं है। जो चाहे जब चाहे कोई भी पोस्ट या उसके किसी भाग का जैसा चाहे उपयोग कर सकता है। 'बहुजन हिताय- बहुजन सुखाय'
Thursday, March 11, 2010
Wednesday, March 10, 2010
मन का फंदा
हर मनुष्य अपने विचारों में डूबा रहता है। कभी ऐसा भी होता है कि विचारों को ही मनुष्य यथार्थ समझ लेता है। विचार जिस घटना के बारे में हों यह आवश्यक नहीं कि वह घटना वर्तमान से कुछ सम्बन्ध रखती हो। यह भी होता है कि घटना केवल कल्पना की उडान ही हो। ऐसी स्थिति में जब मनुष्य उस घटना पर प्रतिक्रिया स्वरुप भावावेग से ग्रस्त हो जाता है। यह विचारों और भावनाओं का कन्फ्यूजन है। जब व्यक्ति शब्दों को उनके अर्थ से अधिक महत्त्व देता है तो इसका मतलब है कि वह शब्दों के मायाजाल में उलझ रहा है। शब्द और उसके फलस्वरूप होने वाली शारीरिक प्रतिक्रियाएं अलग अलग हैं। कल्पना करें कि एक विचार है कि 'आपकी कार का एक्सिडेंट हो गया है'। तुरंत ही मन अपनी प्रतिक्रिया चालू कर देगा। डर के बारे में पसीना निकल सकता है। धड़कन तेज़ हो सकती है या सांस फूल सकती है। परन्तु एक्सिडेंट तो एक कल्पना है। आपके मन ने उसे वास्तविक मान कर प्रतिक्रिया कर दी। विचार को विचार ही रहने दिया जाये और घटना को घटना तभी सही कार्य हो सकेंगे।
यहाँ पर मन विचारों को तथ्यों से ज्यादा महत्व दे रहा है। इसकी वजह से आप किंकर्तव्यमूढ़ हो सकते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति मानसिक छवि को छवि, विचार को विचार, संवेदनाओं को संवेदना ही रहने दे। न उससे कुछ कम न अधिक। मन हमेशा ही आपका सच्चा मित्र नहीं रहता है। विशेष रूप से जब मन बेलगाम घोड़े कि तरह छवि, विचार और संवेदना को एक दूसरे में गड्ड मड्ड कर देता है। और व्यक्ति इस चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाता।
तो क्या चिंता वास्तविक नहीं है। विचार वास्तविक हो, आपके शरीर में होने वाले परिवर्तन जैसे कि हाथ पैर कंपना, धडकन, या पसीना भी वास्तविक हैं। परन्तु उनका अनुभव अलग अलग करना होगा। विचार को विचार रहने दें, शारीरिक परिवर्तनों को शारीरिक परिवर्तन, दोनों का आपस में यदि कंफ्यूजन न किया जाये तो समस्या नहीं होगी।
यहाँ पर मन विचारों को तथ्यों से ज्यादा महत्व दे रहा है। इसकी वजह से आप किंकर्तव्यमूढ़ हो सकते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति मानसिक छवि को छवि, विचार को विचार, संवेदनाओं को संवेदना ही रहने दे। न उससे कुछ कम न अधिक। मन हमेशा ही आपका सच्चा मित्र नहीं रहता है। विशेष रूप से जब मन बेलगाम घोड़े कि तरह छवि, विचार और संवेदना को एक दूसरे में गड्ड मड्ड कर देता है। और व्यक्ति इस चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाता।
तो क्या चिंता वास्तविक नहीं है। विचार वास्तविक हो, आपके शरीर में होने वाले परिवर्तन जैसे कि हाथ पैर कंपना, धडकन, या पसीना भी वास्तविक हैं। परन्तु उनका अनुभव अलग अलग करना होगा। विचार को विचार रहने दें, शारीरिक परिवर्तनों को शारीरिक परिवर्तन, दोनों का आपस में यदि कंफ्यूजन न किया जाये तो समस्या नहीं होगी।
Saturday, March 6, 2010
चिंता के अंग
मनुष्य चिंता करता है तो क्या करता है। मन में कोई विचार जो बार बार उठता है। परन्तु विचार का उठाना चिंता नहीं है। विचार के साथ शारीर में कुछ परिवर्तन होते हैं। जैसेकि- सांस तेज़ चलना, दिल की धड़कन की गति बढ़ जाना, या धड़कन का अनुभव करना, मुह सूखना, पसीना आना, मांस पेशियों का कड़ा होना या फिर हाथ पैर का कम्पन। एक छोटा सा विचार मन में कैसे कैसे परिवर्तन लाता है। ये कैसे हुआ। इस विचार ने शरीर के कुछ होर्मोनों को बढाया जिनकी वजह से ये सारे परिवर्तन आते हैं। अब इस विचार ने हारमोनों को कैसे बढाया, इस मस्तिष्क के बहुत सारे बूझे और अनबूझे रहस्य इसके लिए उत्तरदायी हैं। यदि व्यक्ति प्रयत्न करे तो वह विचार को सिर्फ विचार के रूप में अनुभव करे। शारीरिक परिवर्तनों को शारीरिक परिवर्तनों की तरह। और संवेदना को संवेदना की तरह तो इस तरह से विचार का होर्मोनों से सम्बन्ध टूट जायेगा और फिर देखिये क्या परिणाम मिलते हैं।
परन्तु यह कैसे किया जा सकता है। थोडा प्रयत्न करना होगा। किसी शांत जगह पर आराम से बैठ झएं। आँखे बंद कर लें। अपनी सांस की लय की तरफ ध्यान दें। जो भी विचार मन में उठता है उसको वहीँ रहने दें। शरीर से आने वाले संकेतों को समझें। पेट में गुड-गुड हो या मांसपेशियों में थकान महसूस हो, जहाँ जहाँ आपका शरीर कुर्सी से छू रहा है वहां पर कैसा अनुभव हो रहा है। हवा शरीर से टकराती है तो कैसा लगता है। इन सब चीजों के बारे में गौर फरमाएं। इतना काफी है। जिन्हें और अधिक करना है वो विपस्चना मेडिटेशन सीख सकते हैं। इसके लिए ढेरों वेबसाइट्स हैं जहाँ मेडिटेशन का फ्री ऑडियो उपलब्ध है।
परन्तु यह कैसे किया जा सकता है। थोडा प्रयत्न करना होगा। किसी शांत जगह पर आराम से बैठ झएं। आँखे बंद कर लें। अपनी सांस की लय की तरफ ध्यान दें। जो भी विचार मन में उठता है उसको वहीँ रहने दें। शरीर से आने वाले संकेतों को समझें। पेट में गुड-गुड हो या मांसपेशियों में थकान महसूस हो, जहाँ जहाँ आपका शरीर कुर्सी से छू रहा है वहां पर कैसा अनुभव हो रहा है। हवा शरीर से टकराती है तो कैसा लगता है। इन सब चीजों के बारे में गौर फरमाएं। इतना काफी है। जिन्हें और अधिक करना है वो विपस्चना मेडिटेशन सीख सकते हैं। इसके लिए ढेरों वेबसाइट्स हैं जहाँ मेडिटेशन का फ्री ऑडियो उपलब्ध है।
Friday, March 5, 2010
डर और उद्दिग्नता
The truth is that our finest moments are most likely to occur when we are feeling deeply uncomfortable, unhappy or unfulfilled. For it is only in such moments propelled by our discomfort, that we are likely to step out of our ruts and start searching for truer answers.--M.Scot Peck.
कभी आपको ऐसा लग सकता है की आप बहुत अकेले हैं। मेरी उद्दिग्नता बहुत अधिक है और मुझे कोई समझने वाला नहीं है।
मई आपको बता दूँ कि ऐसा सोचने वाले आप अकेले नहीं है। सामान्य चिंता विकार से ग्रस्त व्यक्तियों की संख्या बहुत अधिक है। वे हर शहर, प्रदेश और देश में रहते हैं। वे सभी जातियों में पाए जाते हैं। वे गरीब या आमिर किसी को भी हो सकते हैं।
दर और उद्दिग्नता में अंतर
डर एक त्वरा प्रतिक्रिया है जो जीवन बनाये रखने के लिए बहुत आवश्यक है।जब हमारा जीवन या सुरक्षा खतरे में रहते हैं। ये हमें सुरक्षात्मक कदम उठाने के लिए सहायता करती है। जब यह भावना उदित होती है तब बहुत सारी क्रियाएं शरीर में होती हैं। धड़कन बढ़ जाती है। सांस फूल सकती है। ब्लड प्रेसर बढ़ सकता है। गर्मी का अनुभव होता है। पेट में गड़बड़ महसूस हो सकती है चक्कर और पसीना आ सकता है।
ये सभी प्रतिक्रियाये आपको अतिरिक्त उर्ज्या प्रदान करती हैं। यह हार्मोन एड्रीनलीन के कारण होने वाले परिवर्तन हैं। यह व्यक्ति के लड़ने या भागने की पुर्वतैयारी है।
डर से आप अपने आस पास की वस्तुओं के प्रति अधिक सजग हो जाते हैं। इसके कारण आप डर के कारण की तरफ पैनी नज़र रख सकते हैं। यह आपको विपरीत परिस्थितियों में त्वरित कार्य करने के लिए मदद करता है।
इसके विपरीत उद्दिग्नता इक ऐसी स्थिति है जो भविष्य में होने वाली किसी घटना के लिए होती है। इसमे चिंता मांसपेशियों में तनाव और वे सभी परिवर्तन होते हैं जो डर में होते है। परन्तु ये परिवर्तन उतने तीव्र नहीं होते जितने कि एन्ग्ज़ाइटी में होते हैं। परन्तु ये काफी लम्बे समय तक चल सकते हैं। कम या अधिक मात्रामें दिनों हफ़्तों, या महीनो- सालों चल सकते हैं। उद्दिग्नता का स्त्रोत मन है न कि खतरे का वास्तविक रूप से होना।
कभी आपको ऐसा लग सकता है की आप बहुत अकेले हैं। मेरी उद्दिग्नता बहुत अधिक है और मुझे कोई समझने वाला नहीं है।
मई आपको बता दूँ कि ऐसा सोचने वाले आप अकेले नहीं है। सामान्य चिंता विकार से ग्रस्त व्यक्तियों की संख्या बहुत अधिक है। वे हर शहर, प्रदेश और देश में रहते हैं। वे सभी जातियों में पाए जाते हैं। वे गरीब या आमिर किसी को भी हो सकते हैं।
दर और उद्दिग्नता में अंतर
डर एक त्वरा प्रतिक्रिया है जो जीवन बनाये रखने के लिए बहुत आवश्यक है।जब हमारा जीवन या सुरक्षा खतरे में रहते हैं। ये हमें सुरक्षात्मक कदम उठाने के लिए सहायता करती है। जब यह भावना उदित होती है तब बहुत सारी क्रियाएं शरीर में होती हैं। धड़कन बढ़ जाती है। सांस फूल सकती है। ब्लड प्रेसर बढ़ सकता है। गर्मी का अनुभव होता है। पेट में गड़बड़ महसूस हो सकती है चक्कर और पसीना आ सकता है।
ये सभी प्रतिक्रियाये आपको अतिरिक्त उर्ज्या प्रदान करती हैं। यह हार्मोन एड्रीनलीन के कारण होने वाले परिवर्तन हैं। यह व्यक्ति के लड़ने या भागने की पुर्वतैयारी है।
डर से आप अपने आस पास की वस्तुओं के प्रति अधिक सजग हो जाते हैं। इसके कारण आप डर के कारण की तरफ पैनी नज़र रख सकते हैं। यह आपको विपरीत परिस्थितियों में त्वरित कार्य करने के लिए मदद करता है।
इसके विपरीत उद्दिग्नता इक ऐसी स्थिति है जो भविष्य में होने वाली किसी घटना के लिए होती है। इसमे चिंता मांसपेशियों में तनाव और वे सभी परिवर्तन होते हैं जो डर में होते है। परन्तु ये परिवर्तन उतने तीव्र नहीं होते जितने कि एन्ग्ज़ाइटी में होते हैं। परन्तु ये काफी लम्बे समय तक चल सकते हैं। कम या अधिक मात्रामें दिनों हफ़्तों, या महीनो- सालों चल सकते हैं। उद्दिग्नता का स्त्रोत मन है न कि खतरे का वास्तविक रूप से होना।
कुछ अलग परिणाम पाने के लिए
" क्या चिंता ने अन्दर ही अन्दर आपको उससे लड़ने के लिए तैयार किया या फिर भागने के लिए, परन्तु विचार से लड़ कर या भागकर आप कहाँ जायेंगे, वो तो हमेशा आपके साथ ही रहेगा।
क्या कुछ मानसिक चित्र, कुछ विचार इतने प्रभावशाली हो सकते हैं किजीवन दूभर कर दें। हाँ ऐसा है, परन्तु इसलिए नहीं कि ये विचार इतने ताकतवर हैं। वरना इसलिए कि हम खुद उन विचारों को ताकत देते हैं। उनसे लड़कर।
"जीवन एक पवित्र यात्रा है। यह यात्रा है परिवर्तन की, विकास की, खोज, गति, रूपांतरण, दृष्टिकोण केपरिवर्तन की, स्पष्ट और भेदक दृष्टि को सीखने की, अपनी आत्मा की आवाज़ पहचानकर ताकतवर कदमो से उसरास्ते पर चलने की जहाँ हर पग पर संघर्ष है। आप उस राह पर वहीँ पर खड़े हैं जहाँ आपको होना चाहिए और यहाँसे सिर्फ आप आगे जा सकते हैं, अपने जीवन को आकृति देने, और इस जीवन की कहानी को विजय, वीरता, विवेक, शक्ति, प्रेम और आत्मबल की महागाथा का निर्माण करने।"-- केरोलिन अडम्स।
कुछ अलग परिणाम प्राप्त करने हों तो कुछ अलग करना होता है। "यदि आप वही करते रहे जो हमेशा करते हैं तो वही परिणाम मिलेंगे जो आपको हमेशा मिलेथे"- जेम्स हैज़ ।
विकल्प क्या है
एक अच्छी बात यह है कि विकल्प हैं। चिंता और डर से लड़ने कि बजाय क्यों न हम उससे समझौता करलें। हम उसे अच्छे से समझें। उस चिंता के क्या अंग हैं, कुछ विशेष विचार, और इन विचारों की वजह से शरीरके विभिन्न अंगोमें होने वाले परिवर्तन। ये परिवर्तन क्या हैं। ह्रदय की गति बढ़ जाना, धड़कन, पसीना, सांस फूलना, हाथ कांपना, मन में एक तूफान खड़ा हो जाना। अरे ये सभी तो एड्रीनलीन हारमोन के कारण होने वाले परिवर्तन हैं। तो
क्या कुछ मानसिक चित्र, कुछ विचार इतने प्रभावशाली हो सकते हैं किजीवन दूभर कर दें। हाँ ऐसा है, परन्तु इसलिए नहीं कि ये विचार इतने ताकतवर हैं। वरना इसलिए कि हम खुद उन विचारों को ताकत देते हैं। उनसे लड़कर।
"जीवन एक पवित्र यात्रा है। यह यात्रा है परिवर्तन की, विकास की, खोज, गति, रूपांतरण, दृष्टिकोण केपरिवर्तन की, स्पष्ट और भेदक दृष्टि को सीखने की, अपनी आत्मा की आवाज़ पहचानकर ताकतवर कदमो से उसरास्ते पर चलने की जहाँ हर पग पर संघर्ष है। आप उस राह पर वहीँ पर खड़े हैं जहाँ आपको होना चाहिए और यहाँसे सिर्फ आप आगे जा सकते हैं, अपने जीवन को आकृति देने, और इस जीवन की कहानी को विजय, वीरता, विवेक, शक्ति, प्रेम और आत्मबल की महागाथा का निर्माण करने।"-- केरोलिन अडम्स।
कुछ अलग परिणाम प्राप्त करने हों तो कुछ अलग करना होता है। "यदि आप वही करते रहे जो हमेशा करते हैं तो वही परिणाम मिलेंगे जो आपको हमेशा मिलेथे"- जेम्स हैज़ ।
विकल्प क्या है
एक अच्छी बात यह है कि विकल्प हैं। चिंता और डर से लड़ने कि बजाय क्यों न हम उससे समझौता करलें। हम उसे अच्छे से समझें। उस चिंता के क्या अंग हैं, कुछ विशेष विचार, और इन विचारों की वजह से शरीरके विभिन्न अंगोमें होने वाले परिवर्तन। ये परिवर्तन क्या हैं। ह्रदय की गति बढ़ जाना, धड़कन, पसीना, सांस फूलना, हाथ कांपना, मन में एक तूफान खड़ा हो जाना। अरे ये सभी तो एड्रीनलीन हारमोन के कारण होने वाले परिवर्तन हैं। तो
Thursday, March 4, 2010
चिंता: उपचार के नए रास्ते
चिंता से एक नए प्रकार का रिश्ता कायम करना आवश्यक है। कुछ विचार, यादें और परिस्थितियां चिंता उत्पन्न कर सकती हैं। ये जो चिंता के ट्रिगर हैं उसका कारण व्यक्ति के जीवन के वो भावनात्मक घाव है जो अभी तक भरे नहीं हैं. उनको स्वीकार करके ही चिंतामुक्त हुआ जा सकता है। यदि उन घावों को बार बार दबाया जाये और व्यक्ति अपने आप को उन मानवीय भूलों के लिए माफ़ न करे तो वे घाव चिंताविकारों के रूप में उदित हो जाते हैं। कोई भी यह नहीं चाहेगा की वह चिंताविकारों से ग्रस्त रहे। परन्तु जबतक सामान्य चिंता विकारों(जी ऐ डी) को दबाने की कोशिश की जाती रहेगी या फिर अन्य नकारात्मक तरीकों का प्रयोग किया जायेगा जैसे कि पलायन, छुपाना, संघर्ष या दबाव सुधार नहीं होगा।
सामान्य चिंता विकार:
चिंताविकारों के इलाज के लिए संज्ञान व्यावहार उपचार पद्धति बहुत प्रचलित है.
चिंताग्रस्त व्यक्तियों क यह सिखाया जाता है किअपने विचारों को किस प्रकार से बदलना है। घातक ऋणात्मक विचारों बारे में यह विचार करना कि वे अवास्तविक हैं और स्थान पर वास्तविक एवं धनात्मक विचार करना
एक और पद्धति है जिसमे चिंताविकार व्यक्ति को बार बार उन्ही परिस्थितियों में ले जाया जाये जब ये विचार उत्पन्न होते हैं। बार बार उन्ही अनुभवों से गुजरने के बाद व्यक्ति यह समझ जाता है कि ये विचार काल्पनिक हैं।
प्रायः चिंता के लिए कुछ ट्रिगर होते हैं। ये व्यक्ति के मन में उठने वाले कुछ विचार, स्वयम के शरीर से आने वाले कुछ संवेदनाएं हो सकती हैं या फिर वातावरण में मौजूद किसी भी कारण के प्रति व्यक्ति अधिक सूक्ष्म ग्राही हो सकता है।
बार बार इनके अनुभवों से गुजरने के बाद व्यक्ति डर से मुक्ति पा सकता है।
परन्तु ऐसा देखा गया है कि यह वास्तव हैं में उतना प्रभावकारी नहीं है। इस विधि से उपचार के बाद भी समस्या बनी रह सकती है या फिर कुछ समय बाद फिर उत्पन्न हो जाती है।
चिंताग्रस्त व्यक्तियों क यह सिखाया जाता है किअपने विचारों को किस प्रकार से बदलना है। घातक ऋणात्मक विचारों बारे में यह विचार करना कि वे अवास्तविक हैं और स्थान पर वास्तविक एवं धनात्मक विचार करना
एक और पद्धति है जिसमे चिंताविकार व्यक्ति को बार बार उन्ही परिस्थितियों में ले जाया जाये जब ये विचार उत्पन्न होते हैं। बार बार उन्ही अनुभवों से गुजरने के बाद व्यक्ति यह समझ जाता है कि ये विचार काल्पनिक हैं।
प्रायः चिंता के लिए कुछ ट्रिगर होते हैं। ये व्यक्ति के मन में उठने वाले कुछ विचार, स्वयम के शरीर से आने वाले कुछ संवेदनाएं हो सकती हैं या फिर वातावरण में मौजूद किसी भी कारण के प्रति व्यक्ति अधिक सूक्ष्म ग्राही हो सकता है।
बार बार इनके अनुभवों से गुजरने के बाद व्यक्ति डर से मुक्ति पा सकता है।
परन्तु ऐसा देखा गया है कि यह वास्तव हैं में उतना प्रभावकारी नहीं है। इस विधि से उपचार के बाद भी समस्या बनी रह सकती है या फिर कुछ समय बाद फिर उत्पन्न हो जाती है।
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