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Wednesday, March 17, 2010

सामाजिक विकलांगता

जब किसी स्तिथि में व्यक्ति तनाव या चिंताग्रस्त होता है तो उसके मन एवं शरीर में हारमोनो की वजह से कुछ परिवर्तन होते हैं। ये परिवर्तन और चिंता सम्बन्धी विचार दोनों मिलकर काफी डरावनी स्तिथि पैदा कर देते हैं। ये दोनों एक दूसरे को बढ़ाने का काम भी करते हैं।

स्वाभाविकतया कोई भी चाहेगा की इस तरह की अनचाही और डरावनी स्थिति न पैदा हो। बस यहीं से परेशानी की शुरुवात हो जाती है। व्यक्ति इस तरह की परिस्थिति एवं विचार का सामना करने की स्थिति न आये ऐसा प्रयत्न करता है। और ये प्रयत्न ही व्यक्ति के जीवन को सीमित कर देते हैं।
आपने भी देखा होगा कि इस तरह से पीड़ित व्यक्ति कैसे कुछ विशेष परिस्थितियों, स्थानों, घटनाओं या व्यक्तियों से बचने के लिए अपने दैनिक जीवन क्रम में परिवर्तन लाते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य डर और चिंता से बचना होता है। परन्तु उनसे बचने के लिए वे प्रतिदिन सैंकड़ों ऐसी स्थितियों से बचते हैं जो उनके जीवन के लिए महत्वपूर्ण होती।

सोशल एन्ग्जाएटी से पीड़ित व्यक्ति समूह में रहना या बात करना टालता है। वह पार्टियों में एक कोने में खड़े होकर मोबाइल पर या अन्य किसी कार्य में व्यस्त होने का नाटक कर सकता है। या फिर पार्टियों में जाना ही बंद कर सकता है। सभाओं में बोलना उसके लिए संभव नहीं हो पता। वह बोलने की कोशिश ही नहीं करता।
इन सब कारणों से वह अपना जीवन ही नहीं जी पाता। उसको मिलने वाले मौके सीमित हो जाते हैं। वह समाज से कट जाता है। आत्मीय सम्बन्ध बनाना उसके लिए संभव नहीं हो पाता। थोड़े में इसे हम सामजिक विकलांगता कह सकते है।

Monday, March 15, 2010

उद्दिग्नता के साथी

चिंता के इन सब प्रकारों के आलावा भी कुछ और प्रकार है, जैसे कि obsessive compulsive neurosis और पोस्ट ट्रोमेटिक स्ट्रेस डिसोर्डर। ये भी एन्ग्जाईटी के ही प्रकार हैं।
कुछ विशेष प्रकार कि समस्याएं उद्दिग्नता के साथ साथ बनी रह सकती हैं, जैसे कि अवसाद या शराबखोरी। कभी कभी कुछ शारिरिक बीमारियाँ भी होती हैं जिसमे ऐसे लक्षण मिल सकते हैं। इन बिमारियों का भी सही निदान ज़रूरी है। इन बीमारियों में थायरोइड ग्रंथि के विकार, अस्थमा, ह्रदय रोग इत्यादि शामिल हैं।


अवसाद (depression)

अवसाद एक ऐसी मानसिक अवस्था है जब व्यक्ति हमेशा दुखी रहता है। उसे एक प्रकार का खालीपन रहता है। वह अपने आप के प्रति निराश रहता है। उसे अपने भविष्य से भी कोई आशा नहीं रहती। बहुत से लोग ये संदेह करते हैं कि क्या उनकी दशा कभी सुधर पायेगी। थकावट, उत्साह की कमी, कमज़ोर याददाश्त, निर्णय लेने में कठिनाई, चिडचिडापन और नींद की तकलीफ ये इसके प्रमुख लक्षण हैं। लोग ऐसा महसूस करते हैं कि जीवन आनंददायक नहीं है।

नशे की आदत

उद्दिग्नता से पीड़ित व्यक्ति अपनी उद्दिग्नता कम करने के लिए शराब का सहारा ले सकता है। यह बहुत ही खतरनाक है। क्योंकि शराब का नशा थोड़ी देर तो राहत दिला सकता है। परन्तु नशा उतरते ही फिर उद्दिग्नता बढ़ जाती है। इससे शराब कि आदत लग सकती है। अब दो समस्याएं हो जाती हैं, एक तो उद्दिग्नता और दूसरी शराब की आदत।
इसके अलावा अन्य नशीले पदार्थों का भी सेवन उद्दिग्नता से पीड़ित व्यक्ति कभी कभी करते हैं।

Sunday, March 14, 2010

सामान्य उद्दिग्नता विकार (generalised anxiety diorder)

इस प्रकार के एन्क्जाईटी विकार में लोग अनावश्यक रूप से अनेक घटनाओं और क्रियाओं के बारे में चिंता करते हैं। आमतौर पर लोग यह शिकायत करते हैं कि वे प्रतिदिन के कार्यों से थक गए हैं, प्रतिदिन के कार्य ही उनपर भारी पड़ रहे हैं। चिंता जीवन का स्थायी अंग बन जाता है। और इससे घर और बाहर दोनो के काम प्रभावित होते हैं। नीचे दिए हुए वाक्यांशों में से आप पर भी कुछ लागु होता है क्या:

-चिडचिडाहट
-नींद न आना या टूट जाना
-किसे काम में मन न लग पाना
-थोड़े से काम से थक जाना
-मांसपेशियों में तनाव
-सतत कुछ अनावश्यक कार्य करते रहना restlessness
-यह मालूम होते हुए भी कि चिंता करना व्यर्थ है चिंता करते रहना
-चिंता को काम करने के प्रयत्न के लिए चिंता करना।

सोशल एन्ग्जाईटी (social anxiety)

सोशल फोबिया एक तीव्र दर है जिसमे शर्म और अपमान भी शामिल है। आमतौर पर यह तब होता है जब औरों की उपस्थिति में कोई कार्य करना हो। विशेष रूप से पीड़ित व्यक्ति यह समझता है कि वह कुछ ऐसा न कर बैठे जिससे लोग उसे कमज़ोर, अकर्मण्य, मुर्ख या अयोग्य समझें। उसे यह भी डर लगता है कि लोग उसकी असहजता को समझ रहे हैं। यह आमतौर पर सबसे अधिक होने वाला उद्दिग्नता का प्रकार है।

क्या इसमें से कोई डर है:


लोगों के सामने बोलने में,
लोगों के सामने शर्म से लाल होने में,
पार्टियों में भोजन करते समय पानी गिराने या गले में भोजन अटकने,
जब अन्य लोग मौजूद हों तो कुछ लिखने ,
काम करते समय आपको कोई देख रहा है,
भीड़ में जाने में,
सार्वजानिक गुसलखाने का प्रयोग करने,

तो आप सोशल फोबिया से ग्रस्त हो सकते हैं।

कुछ लोग इसके साथ पेनिक अटेक भी महसूस करते हैं।

अपनी परेशानी काम करने के लिए सोशल फोबिया से पीड़ित व्यक्ति सार्वजनिक समारोहों से जितना संभव हो सके दूर रहता है। समारोहों में बात करना, मीटिंग में शामिल होना, भाषण देना, सामूहिक कार्य, फोन पर बात करना, सार्वजनिक यातायात साधनों का प्रयोग करना उसके लिए कठिन होता है। इन सब कारणों से उसका जीवन बहुत संकुचित हो सकता है।


नरेश की कहानी:

मै बी एड की पढाई कर रहा हूँ। जहाँ तक मुझे याद है मै शुरू से ही सामजिक उद्दिग्नता से पीड़ित था। बचपन में भी मै अकेला ही रहता था। मेरे कोई मित्र नहीं थे। जब मेरे साथ कोई नहीं होता तब भी मुझे ऐसा लगता है कि लोग मेरे बारे में सोच रहे हैं। हर समय जब मै कोई कार्य करता हूँ या कोई बात करता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि मेरी बात या कार्य ठीक न होगा या लोगों को अच्छा न लगेगा। और मै हंसी का पात्र बन जाऊँगा। बात करना भी बहुत प्रयत्नपूर्वक हो पाता है। इसके लिए भी मुझे लम्बी रेहेर्सल करनी पड़ती है। मै अपने बारे में बहुत निगेटिव सोचता हूँ। अगले हफ्ते से मुझे पढ़ाना है। इसकी कल्पना भी मुझे डरावनी लगती है। पिछले सेमेस्टर में जब मैंने छात्रों को पढाया था तो वह मेरे लिए टॉर्चर के सामान था। मै रोता था। मुझे प्रतिदिन पेनिक अटेक आता था। मै बहुत डर गया था। मै अपने हॉस्टल के साथियों से बात भी नहीं करता था। मेरा खाना खाना भी दूभर हो गया था। बोलने के लिए बहुत बहुत रिहर्सल के बाद भी मेरी जुबान तालू से चिपक जाती थी। मुझे नहीं मालूम कि यह कैसे ठीक हो सकता है। मेरा वजन ५ किलो कम हो गया था।

विशेष डर

विशेष डर (specific phobias):
हर व्यक्ति किसी न किसी बात से डरता है। परन्तु विशेष डर या फोबिया तब कह सकते हैं जब कोई व्यक्ति किसी विशेष स्थान या वस्तु से इतना डरता है कि वह ऐसी वस्तु या स्थान का सामना करने से भी डरता है एवं ऐसी परिस्थितियों को अवोइड करता है। फोबिया से पीड़ित व्यक्ति भी उसी प्रकार से प्रतिक्रिया करता है जैसे कि पेनिक अटेक से पीड़ित व्यक्ति, परन्तु एक अंतर है कि यह प्रतिक्रिया उस वस्तु या स्थान की उपस्थिति में होती है। फोबिया से पीड़ित व्यक्ति उस स्थान या वस्तु से भागने के लिए तत्पर रहता है। परिस्थिति के अनुसार फोबिया जीवन को सीमित कर भी सकते हैं या नहीं भी। उदाहरनार्थ कोई व्यक्ति जो सांपों से डरता है अगर शहर में रहता है अपना सारा जीवन आराम से काट सकता है। जबकि कोई किसान यदि इसी फोबिया से पीड़ित हो तो उसका जीवन दूभर हो सकता है।

पीड़ित व्यक्ति यह जनता है कि उसका डर अनावश्यक है परन्तु फिर भी इससे उसकी प्रतिक्रिया में कोई अंतर नहीं आता। आमतौर पर ज़्यादातर फोबिया जानवरों, ऊंचाई, बंद कमरों, रक्त, चोट लगना, तूफ़ान, बिजली चमकने या हवाई यात्रा से होता है।

फोबिया से पीड़ित अधिकांश लोग कोई इलाज नहीं करवाते। वे केवल डरावनी वस्तु को अवोइड करते हैं। उनके डर का कारण स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है।

कविता की कहानी

कविता एक आफिस में क्लर्क है। उसे बंद कमरों का बहुत डर लगता है। वह पांचवे माले पर स्थित अपने आफिस जाने के लिए लिफ्ट का इस्तेमाल नहीं करती। यदि उसे दिन में कई बार आफिस आना जाना पड़े तो वह अवोइड करती है। कभी भी किसी कमरे में अकेली नहीं रहती। कोई न कोई बहाना बना कर वो अपने साथ किसी को बुला लेती है।

Thursday, March 11, 2010

उद्दिग्नता के प्रकार

यदि आप उद्दिग्नता से ग्रस्त हैं तो आपने इसके बारे में काफी कुछ पढ़ा होगा। उद्दिग्नता के प्रकारों के बारे में भी पढ़ा होगा। आपके बीमारी के डाइग्नोसिस से आपका जीवन सुधर नहीं जायेगा। फिर उद्दिग्नता से पीड़ित व्यक्ति किसी विशेष प्रकार की उद्दिग्नता के खांचे में बैठाया जा सके यह आवश्यक नहीं है। सामान्यतया उद्दिग्नता से पीड़ित व्यक्ति किसी डाइग्नोसिस विशेष के खांचे में बैठने की बजाय विभिन्न प्रकार की उद्दिग्नताओं के कहीं बीच में रहता है।
यदि एक बार कोई लेबल लग जाता है तो उसको हटाना मुश्किल रहता है। इसलिए इसका न लगाना ही उचित है। फिर भी हम केवल विवरण की सुविधा के लिए विभिन्न प्रकार के anxiety disorders के बारे में जानना चाहते हैं।

पेनिक अटेक (panic attack)


पनिक अटेक अचानक से डर की अनुभूति होना है। इसके साथ तीव्र शारीरिक संवेदनाये होती हैं जैसे कि उन स्थानों से भागने कीइच्छा होना जहाँ पर ये संवेदनाये होती हैं। साथ ही एक ऐसी मानसिक संभावना की कुछ गंभीर रूप से गलत होने वाला है। दिल की धड़कन का तेज होना, छाती में अकदन या दर्द, साँस फूलना, कंपकपी, पसीना, चक्कर, मितली या उलटी, हाथ पैर का सुन्न या ठंडा पद जाना, या फिर हाथ पैरों या चेहरे पर गर्मी महसूस करना, ये कुछ अनुभव हैं जो पेनिक अटेक के वक्त हो सकते हैं। पागल होने का डर या कुछ असंयमित बर्ताव कर देने का डर भी हो सकता है।


राजेश की कहानी
"जब मै एक नौकरी के इंटरव्यू के लिए जा रहा था तब मुझे ऐसा लगा की मेरा सर घूम रहा है, दिल इतनी जोर से धड़क रहा था मानो छाती फटी पड़ती हो। मेरा सर ऐसा लग रहा था की एक गुब्बारा है और किसी भी क्षण फट सकता है। मेरे हाथ कांप रहे थे और हथेलियाँ गीली थीं। मेरी उँगलियाँ सुन्न लग रही थी। मेरी छाती में इतने तेज़ दर्द हो रहा था मानो मुझे दिल का दौरा पड़ गया हो। समय के साथ चक्कर बढ़ते गए। मैंने अपनी साँस थामने की बहुत कोशिश की पर मै उसमे असफल रहा। मैंने इंटरव्यू देने की कोशिश की पर मुझे कुछ समझ में नहीं आया। "

पेनिक अटेक पेनिक बीमारी में कैसे बदलता है:



बिना किसी कारन के यदि बार बार पेनिक अटेक आते हैं तो ये हो सकता है की आप पेनिक बीमारी से ग्रस्त हों। परन्तु पेनिक अटेक आना यह कोई बीमारी नहीं है। बहुत से लोगों में साल में एकाध बार पेनिक अटेक आते हैं। पेनिक डिसोर्डर का तात्पर्य है कि यदि व्यक्ति अगले अटेक के आने की संभावना से ऐसी व्यक्तियों, एवं स्थानों को टाला जा सके जहाँ पेनिक अटेक आने की सम्भावना रहती है।

सुनीता की कहानी:

मुझे हमेशा घर से बाहर निकलने में डर लगता है। मै इतना डरी हुई रहती हूँ की हमेशा यह ध्यान रखती हूँ की कोई भागने का रास्ता है या नहीं। मंदिर, बाज़ार या अन्य कोई ज़गह मै अकेले जाना पसंद करती हूँ, जिससे की यदि कोई पेनिक अटेक आये तो मेरे साथ मै जो है उसे मालूम न पड़े और मै वहां से भाग कर घर आ सकूँ। या फिर मै किसी ऐसे सुरक्षित व्यक्ति के साथ ही बाहर निकलना पसंद करती हूँ। बाहर जाने पर मेरा पेट गड़बड़ हो जाता है। बाहर जाते समय मै अपने पेट के गड़बड़ होने की वजह से सिर्फ ऐसी जगह जाती हूँ जहाँ पर toilet हो।








Wednesday, March 10, 2010

मन का फंदा

हर मनुष्य अपने विचारों में डूबा रहता है। कभी ऐसा भी होता है कि विचारों को ही मनुष्य यथार्थ समझ लेता है। विचार जिस घटना के बारे में हों यह आवश्यक नहीं कि वह घटना वर्तमान से कुछ सम्बन्ध रखती हो। यह भी होता है कि घटना केवल कल्पना की उडान ही हो। ऐसी स्थिति में जब मनुष्य उस घटना पर प्रतिक्रिया स्वरुप भावावेग से ग्रस्त हो जाता है। यह विचारों और भावनाओं का कन्फ्यूजन है। जब व्यक्ति शब्दों को उनके अर्थ से अधिक महत्त्व देता है तो इसका मतलब है कि वह शब्दों के मायाजाल में उलझ रहा है। शब्द और उसके फलस्वरूप होने वाली शारीरिक प्रतिक्रियाएं अलग अलग हैं। कल्पना करें कि एक विचार है कि 'आपकी कार का एक्सिडेंट हो गया है'। तुरंत ही मन अपनी प्रतिक्रिया चालू कर देगा। डर के बारे में पसीना निकल सकता है। धड़कन तेज़ हो सकती है या सांस फूल सकती है। परन्तु एक्सिडेंट तो एक कल्पना है। आपके मन ने उसे वास्तविक मान कर प्रतिक्रिया कर दी। विचार को विचार ही रहने दिया जाये और घटना को घटना तभी सही कार्य हो सकेंगे।

यहाँ पर मन विचारों को तथ्यों से ज्यादा महत्व दे रहा है। इसकी वजह से आप किंकर्तव्यमूढ़ हो सकते हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति मानसिक छवि को छवि, विचार को विचार, संवेदनाओं को संवेदना ही रहने दे। न उससे कुछ कम न अधिक। मन हमेशा ही आपका सच्चा मित्र नहीं रहता है। विशेष रूप से जब मन बेलगाम घोड़े कि तरह छवि, विचार और संवेदना को एक दूसरे में गड्ड मड्ड कर देता है। और व्यक्ति इस चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाता।

तो क्या चिंता वास्तविक नहीं है। विचार वास्तविक हो, आपके शरीर में होने वाले परिवर्तन जैसे कि हाथ पैर कंपना, धडकन, या पसीना भी वास्तविक हैं। परन्तु उनका अनुभव अलग अलग करना होगा। विचार को विचार रहने दें, शारीरिक परिवर्तनों को शारीरिक परिवर्तन, दोनों का आपस में यदि कंफ्यूजन न किया जाये तो समस्या नहीं होगी।